Rooh Ki Baat
रूह की बात जिस्म नहीं समझता,
दिल की बात ज़माना नहीं समझता,
यह दर्द मेरा अपना है,
इसे अब मैं ही समझता हूँ।
Rooh ki baat jism nahi samajhta,
Dil ki baat zamaana nahi samajhta,
Yeh dard mera apna hai,
Ise ab main hi samajhta hoon.
روح کی بات جسم نہیں سمجھتا
The body does not understand the soul, and the world does not understand the heart; this pain is the speaker's alone.
आँखों में समंदर है मेरा,
मगर कोई नहीं देखता,
हर आँसू एक कहानी है,
मगर कोई नहीं सुनता।
जुदाई का दर्द वो जाने,
जिसने मोहब्बत की हो,
बिछड़ने के बाद की रातें,
सिर्फ़ वही समझ सकता है।
ख़ुद से बातें करना सीख गया हूँ,
तनहाई में जीना सीख गया हूँ,
जब से तू गया है ज़िंदगी से,
दर्द को मुस्कुराहट में छुपाना सीख गया हूँ।
तेरी ख़ुशबू अब भी आती है,
उन यादों की पगडंडी पर,
जहाँ हम साथ चलते थे,
वहाँ अब सिर्फ़ मैं हूँ।
तुम्हारी याद आती है रोज़ रात को,
आँखें बंद हों या खुली, बस तुम ही हो,
ये नींद भी अजीब है मेरी,
जागते हुए भी सपने दिखाती है।
शाम होती है तो उदास हो जाता हूँ,
रात आती है तो बेचैन रहता हूँ,
दिन तो बस यूँही गुज़र जाता है,
तेरी याद में दीवाना रहता हूँ।